पतझड़ सा मैं बिखर जाऊंगा

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पतझड़ सा मैं बिखर जाऊंगा
एक दिन सबसे जुदा हो जाउंगा
पर मैं रहूंगा उनके आसपास
सूखी गिरती बिखरी पत्तियों की तरह
 
खाद
, मिट्टी धूल बनकर
लिपट जाऊंगा अपनों के कदमों से
हवाओं पर बैठ चुमूंगा अपनों का माथा
हथेलियों से लिपट एहसास को जियूंगा
जब तूफान आएगा तो दूर परदेश में बसे
अपनों से मिलूंगा और लिपटकर प्यार करूंगा

बारिश के पानी में घुलकर
घर में भी आउंगा नमी बनकर
पर अपने हिस्‍से के रिश्‍तों से
कभी जुदा नहीं होउंगा
 

मैं पतझड़ से जरूर बिखरा हूं
पर आस के साथ आसपास हमेशा ही रहूंगा।
 
 























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