प्यार मौत या मोक्ष

आदित्य देव पाण्डेय
जिंदगी में कभी अचानक ही हम उन अनुभवों से गुजरने लगते हैं जिसका कभी हमारे जीवन में कोई महत्व नहीं होता है। या यूं कहें कि जो हमें सबसे बुरा गुण लगता है। कुछ ऐसा ही भाव युक्त व्यवहार होता है प्यार। न जाने कब यह हमारे जीवन में दाखिल हो हमें अपने कब्जे में ले लेता है मालूम ही नहीं चलता। समझ नहीं आता कि इस समाजिक बुराई में वह कौन सी अच्छाई उस दौरान नजर आने लगती है जब यह हमारे रक्त में वेग का स्वरूप ग्रहण कर लेता है।
    सच कहें तो इसके आने के बाद ही हमें रिश्तों का अहसास होता है। इससे पूर्व सिर्फ हम रिश्तों के नैतिक बुनियाद को ही जी रहे होते हैं। लेकिन इससे भीगने के बाद हम यह जानते हैं कि रिश्ते होते क्या हैं? हम इसी दौरान अपने महत्व से भी परिचित होते हैं और फिर हमारे लिए हर वक्त और व्यक्ति महत्वपूर्ण होने लगते हैं। हम उसी दौरान समाजिक बुराइयों जैसे वह क्या सोचेंगे? वह क्या कह रहे होंगे आदि को दरकिनार कर भारतीय बुराई दहेज, दिखावा और अपव्यय जैसी समस्याओं के विरोधक बन जाते हैं। वास्तव में अद्भुत दौर होता है, जब यह प्रेम हमारे करीब होता है। लेकिन समाज की नजरों का काला जादू ज्यादा देर तक हमारी खुशियों को बर्दास्त नहीं कर पाता और एक समय ऐसा आता है जब सम्पूर्ण अच्छाइयां हमसे दूर हो जाती हैं। ऐसा लगता है मानों हर शख्स हमारा दुश्मन हो। यहां तक की अपनी सांसे भी। सच कहें तो अपनी ही जिंदगी सर्मिंदगी बन जाती है। यार यह भी कैसी आशिकी जो जुदा होने के बाद भी हमें जिन्दा रखे हुए है। अजीब सा दौर होता है। वास्तव में इस घड़ी की काली गली से गुजरते वक्त ही यह अहसास होता है कि आखिर कैसे एक जिंदादिल युवा अपनी इहलीला को इतनी सहजता से समाप्त कर लेता है। आखिर जीवन का दर्द इतना ज्यादा है कि उसे इस तरह के मौत के पैमाने सरल और सहज नजर आने लगते हैं। लेकिन सच कहूं तो हां। शायद इसीलिए बहुत से लोग इन्हें कायर कहते हैं। क्योंकि वह इंसान ही क्या जो दर्द से भाग जाए। हम मां के गर्भ से निकलने के बाद से ही जीवन के लिए संघर्ष शुरू कर देते हैं। फिर एक भावुक दर्द की इतनी महत्ता क्यों दें कि वह हमारे जीवन के अन्य अनुभवों पर ही विराम लगा दे। लेकिन यह तय है कि शबे फिराक जैसे मर्ज की दवा सिर्फ मौत है। जहां तक मेरा मानना है कि प्रेम से बिलगाव के बाद वास्तव में हमारा शरीद जिंदा रहता है, पर हम नहीं। हम चेतना पूर्ण दुनिया से परे हो चैतन्य को पा लेते हैं। जहां अब मायावी दुनिया के सारे सुख दुख बौने प्रतीत होने लगते हैं। और यही वजह है कि  कुछ जख्म ऐसे हो जाते हैं जिनका दर्द हमेंशा बना रहे तभी मजा आता है। ऐसा ही जख्म होता है प्यार के बाद बिछड़ना।
    वास्तव में यह समझ पाना कठिन है कि एक साथी जो कल तक अपनी प्रेमिका के लिए सबसे क्यूट और सॉफ्ट होता है। वही अचानक कैसे रौंद्र रूप ग्रहण कर लेता है। यही नहीं वह कौन सी दशा होती है जो उसे ऐसा स्वरूप ग्रहण करने पर मजबूर कर देती है। उसमें अचानक ऐसा बदलाव आता ही क्यों है। वह अपनी प्रेमिका के लिए सबसे अच्छे से सबसे बुरा कैसे बन जाता है। वह कौन सी मानवीय ग्रंथी की उग्रता है जो उसको एक प्यारे इंसान से हैवान तक का सफर तय करा देती है। कैसे वह अपनी सबसे चहेती साथी के प्रति इतना उग्र हो जाता है। कुछ इस भड़ास को अपनी कलाइयों पर आजमा लेते हैं तो कुछ नदियों के पूल और रेलवे ट्रेक पर। लेकिन प्रश्न यहां यह जरूर छोड़ जाते हैैं कि वह कौन सी दशा या भाव है जिसके कारण वह इस अंतिम दर्द को सहजता से सह जाते हैं बसर्ते कि जीवन। यहां प्रेम का एक रूप और स्पष्ट होता है कि प्रमिका के परिजन अपनी क्रोध की ज्वाला में प्रेमी को भून रहे होते हैं तो वह अपने कदम पीछे करने के बजाय उसमें जलना ज्यादा पसंद करता है। उसे पीछे हटने से ज्यादा आनंद समाज और परिवार से लड़ने में आने लगता है। आखिर ऐसा क्या है? काम या सेक्स भावना में इतनी पुष्टता तो नहीं ही होगी कि वह प्रेमी की त्वचा को संवेदनाहीन कर दे। और जहां तक प्रेम में काम के स्थान की बात है, तो वह महत्वहीन व पारदर्शी होंगी, क्योंकि आज तक किसी भी प्रेमी में यह प्रेमालाप के वक्त दीखी ही नहीं।
    प्रेम में मृत्यु का स्थान वास्तव में कायरता का ही पर्याय है। मजा तो वास्तव में इसमें रम जाने में है। प्रेम भावनाओं का पूंज है, जो कभी समाप्त ही नहीं होता। इस पुंज की आभा तो सदैव प्रेमी और प्रेमिका के इर्द गिर्द उद्विपित होती रहती है और इन्हें दिव्य आनंद से लाभांवित करती रहती है। यह अपने ओज से उन्हें धनी किए रहती है। यह तो उसी प्रकार है, जैसे स्वयं ईश्वर प्रेम स्वरूप में उसके अंदर प्रविष्ठ हो उसकी आत्मा को स्वच्छ कर अपने में समाहित कर लिए हों। शायद जीवन का अंत भी इतना ही सुखद होता होगा। या जो सुख मानव स्वर्ग में पाता होगा, वही सुख प्रेम में प्राप्त होता है। दुख या आत्महत्या अथवा बदले जैसी भावनाएं उन्हें प्रभावित करती हैं, जिसने किसी सुंदर या आकर्षक काया से प्रेम किया हो। वह व्यक्ति जो अदृश्य चेतना और भाव से प्रभावित हुआ था, वह ईश्वर का अंश हो जाता है। उसे मृत्यु और जीवन का फर्क समझ आ जाता है। वह मृत्युलोक में ही स्वर्ग का आनंद लेता है। वह तो परम आत्मा बन परमात्मा को प्राप्त हो जाता है। फिर न तो उसे   कोई दुख दुखी कर सकती है और नहीं ही किसी सुख में इतना दम भी उसके मन को भटका सके। वह स्वयं में सुख बन जाता है। उसे कोई बाहरी सुख प्रभावित नहीं कर सकती। भले ही वह उसके किसी भी परम पसंदीदा रूप में उसके समझ आ जाए। वास्तव में यह प्रेम ही तो है जिसने मीरा, राधा, रसखान, कबीर, तुलसी और सुरदास को माया से विरक्त कर वास्तविक सुख से ओत प्रोत कर अमर बना दिया और वह अपने जीवन काल में ही मोक्ष को प्राप्त कर सके।

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