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हर कमरा अब घर बन गया

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आगन के बीच में प्रीत की बहती रीत थी। भैया-भाभी ,  दादा-दादी पिता ,  मां-बहनों की मीत थी। चाचा-चाची ,  ताई-ताऊ बुआ ,  मौसी ,  मामी की गीत थी।   वक्त बदला ,  बदली कहानी कमाई पर रोने लगी आंगन की रानी। हरिश्‍चंद्र बनी ब्याही बहने भाभियों ने थामी आंगन में बंधी डोर थी। बहनों ने भाइयों की आंखें खोली भाभियों को दिखती आंगन में अब खोट थी। भाई-ताऊ को वेतन कम पड़ता हर कमरे में परेशानी की होड़ थी। खुशहाल आंगन हुआ विरान और कमरों में अपनों की परिभाषा लिखती नई ज्योति थी। गद्दार ,  झूठा ,  चोर बने भाई-भतीजा उधर सीता-राम दिखाने की काल्पनिक सोच थी। सूना आंगन अब है सुनता परिवार में बहती प्रेम की जो नई रीत थी। 

आज मैंने स्‍टेटस देखा

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आज मैंने मोबाइल स्‍टेटस देखा अपना नहीं बहुतों का देखा। अपने अपनों व सपनों को देखा अच्‍छी-अच्‍छी बाते देखा। भाई , दीदी , पापा-मम्‍मी को देखा दिवस , दिन , रिश्‍तों का महोत्‍सव देखा। स्‍टेटस पर प्रेम का बहता दरिया देखा सहयोग , साथ , सेवा को देखा।   भक्ति देखी , करूणा देखा दया , दान , भाइचारे को देखा दान-दक्षिणा , लंगर-भंडारे को देखा मौन को भी कर्म का बखान करते देखा। एक फोन कॉल से अब इनकी बातों को देखा अपनों को भी मझधार में डूबाते देखा। तड़पते , रोते , परेशान और कराहते देखा सिर्फ स्‍टेटस पर ही मानवता को सजते देखा। रिश्‍तों की मधुरता को अब तस्‍वीरों में देखा स्‍टेटस पर ही अब सिर्फ परिवार को देखा।