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Showing posts from June, 2013

बुराइयां जरूरी हैं...

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  आदित्य देव पाण्डेय अक्सर यह कहते हम लोगों को सुनते हैं कि फला व्यक्ति बहुत बुरा है। वह बहुत दुष्ट है। लेकिन जब हम अपने को उस स्थान पर देखते हैं तो पाते हैं कि हम उन बुराइयों से काफी परिचित हैं। क्योंकि वह हमारे अंदर भी उसी प्रकार निवास करती है, जिस तरह सामने वाले के व्यवहार में। हम अच्छे इसलिए नहीं हैं कि हमारे अंदर बुराई नहीं है। बल्कि हमारी बुराई अन्य को बहुत कम प्रभावित करती है या कर पा रही है, इसलिए हम अच्छे हैं।     लोग कहते हैं कि ये बुराइयां खत्म हो जाती तो कितना अच्छा होता। तो ऐसे में फिर अच्छे लोग कैसे मिलते यह समझ नहीं आता। अच्छाई की फिर क्या परिभाषा होती और उसके अस्तित्व का आकार कैसा होता? यदि देखा जाए तो अच्छाई का अस्तित्व है ही नहीं, बल्कि वह बुराई का सांकेतिक प्रतीक है। हर बुरा इंसान गतल काम इसलिए नहीं करता कि वह गलत है, बल्कि वह इसलिए करता है कि उससे कुछ उसके लिए अच्छा होगा। अब यहां बुराई उस व्यक्ति के पास नहीं थी, बल्कि अच्छाई ने उसे बुराई की चादर ओढ़ने पर मजबूर कर दिया। अच्छा और अच्छाई दोनों वैचारिक द्वण्द्व के प्रणेता हैं। यह एक अवरोधक की तरह क...

प्यार मौत या मोक्ष

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आदित्य देव पाण्डेय जिंदगी में कभी अचानक ही हम उन अनुभवों से गुजरने लगते हैं जिसका कभी हमारे जीवन में कोई महत्व नहीं होता है। या यूं कहें कि जो हमें सबसे बुरा गुण लगता है। कुछ ऐसा ही भाव युक्त व्यवहार होता है प्यार। न जाने कब यह हमारे जीवन में दाखिल हो हमें अपने कब्जे में ले लेता है मालूम ही नहीं चलता। समझ नहीं आता कि इस समाजिक बुराई में वह कौन सी अच्छाई उस दौरान नजर आने लगती है जब यह हमारे रक्त में वेग का स्वरूप ग्रहण कर लेता है।     सच कहें तो इसके आने के बाद ही हमें रिश्तों का अहसास होता है। इससे पूर्व सिर्फ हम रिश्तों के नैतिक बुनियाद को ही जी रहे होते हैं। लेकिन इससे भीगने के बाद हम यह जानते हैं कि रिश्ते होते क्या हैं? हम इसी दौरान अपने महत्व से भी परिचित होते हैं और फिर हमारे लिए हर वक्त और व्यक्ति महत्वपूर्ण होने लगते हैं। हम उसी दौरान समाजिक बुराइयों जैसे वह क्या सोचेंगे? वह क्या कह रहे होंगे आदि को दरकिनार कर भारतीय बुराई दहेज, दिखावा और अपव्यय जैसी समस्याओं के विरोधक बन जाते हैं। वास्तव में अद्भुत दौर होता है, जब यह प्रेम हमारे करीब होता है। लेकिन समाज की नजरो...

मैं गुण्डा हूं...

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आदित्य देव पाण्डेय आज एक छात्र नेता मेरे आरामगाह में तशरीफ लाए। जहां उन्होंने अपने मनतव्य रखते हुए यह फरमान जारी किया कि विश्वविद्यालय, महाविद्यालय और वहां के विभागाध्यक्षों की बढ़ती दबंगई से छात्रों का भविष्य अधर में जा रहा है। उनके तानाशाह रवैये के कारण छात्र अपने हित और अधिकार की बात स्पष्ट नहीं कर पा रहे हैं। हालांकि मैं उनकी तेज और आक्रोशित विचारधारा को काट नहीं पा रहा था। इसका अर्थ यह नहीं था कि वह सब सही बोल रहे थे। बल्कि वहां की स्थिति यह थी कि वह किसी और को सुनने के मूड में नहीं थे। वह अपने आक्रोश में यह शायद नहीं समझ पा रहे थे कि वह जो बोल रहे हैं वह बिल्कुल तर्क संगत अथवा सही नहीं है।     हालांकि भोजन करने के बाद मेरे जेहन में एक बात आई और मैंने उनसे पूछ ही लिया। भाई साहब! एक चीज बताएंगे? उन्होंने बड़ी ही बड़कपन से बोला। हां हां पूछो। मैंने पूछ : दादा! एक लड़का है वह मेरे कुछ मित्रों को परेशान करता है। कहता है...। उन्होंने इतना सुनते ही तपाक से बोला अरे ऐसा कैसे? साला हमसे बड़ा गुण्डा है। कौन है नाम बताओं? मैंने कहा दादा छोड़ो ना। दरअसल, उसका भाई छात्र नेता है...

बलूची विचार एक फतवा

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  निश्चित ही प्रेम मानवीय भावनाओं ंऔर रिश्तों ंको आयाम देता है। उन्हें बलिष्ठ करता है तथा समाज में हमारे चरित्र को स्थापित करता है। किंतु यही प्रेम यदि हम किसी विपरित लिंगी चरित्र से कर लेते हैं, तो यह सबसे बड़ा दुर्गुण बन हमारे सामने पेश होता है। यहां आज तक समझ नहीं आया कि हम अपने रक्त संबंध के साथ जितनी सहजता से अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त कर लेते हैं। उन्हीं स्वच्छंदताओं के साथ हम उन नए रिश्तों में क्यों नहीं अभिव्यक्ति को प्रकट कर पाते हैं, तो हमें हमारे विद्यालयों, कॉलेजों अथवा अन्य कर्म संस्थाओं मे ं प्राप्त होते हैं अथव बनते हैं। यहां चरित्र का द्वण्द्व हमारे दिमाग को पीड़ित क्यों कर देता है। यह किसी अदृश्य फतवे का ही परिणाम होता है कि हम अपने संपूर्ण ज्ञान और मानसिक स्थिति को धूमिल कर उन संकिर्ण विचार के गुलाम बन जाते हैं। अपनी संपूर्ण शिक्षा और ज्ञान का हम अंत कर देते हैं, जिसमें हमने आत्मबल, स्वविवेक और स्वनिर्णय की दक्षता प्राप्त की होती है। बड़ी हास्यास्पद सी लगती है यह बातें कि हमें जिस उद्देश्य से पढ़ाया और बौद्धिक प्रोढ़ता प्रदान की जाती है, यदि हम उसका उपयोग करने लगें त...

क्या करें कि न करें

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आदित्य देव पांडेय हमारी जिंदगी में जज्बातों की कदर उतनी ही है जितने में हमारे दिमाग की संतुष्टि। इससे ज्यादा यदि जज्बात हम पर कोई उड़ेलता है तो हम घबराने लगते हैं और उससे भागने लगते हैं। और यदि उससे कम जज्बात हम परोसते हैं तो रिश्ते में कभी गर्माहट आती ही नहीं है। ऐसे में यह निर्धारण करना कि किनती मात्रा में जज्बातों को सामने वाले तक पहुंचाना है। काफी कठिन है। लेकिन, एक बात तो तय है कि वर्तमान में मानवीय भावनाओं का स्पंदन और भावों का बहाव कब और कहां बहक जाए उसके स्वामी को भी नहीं पता होता। वह लाख अपनी चारित्रिक स्थिति को प्रोढ़ बनाए पर एक वक्त ऐसा आजा है जब वह उसके हाथों से निकल किसी और के उंगलियों के इसारों पर पतंग की तरह घूमने लगता है। वास्तव में उसी दौरान उसका अस्तित्व और संपूर्ण बौद्धिकता इतराने लगती है सामने की उंगलियों के इसारों पर और वह हवाओं में झूम उठता है अपने को एक स्वतंत्र अस्तित्व समझकर। हालांकि यह इतराना ज्यादा देर तक तो नहीं चलता। क्योंकि आस-पड़ोस की कई कन्नियां उस स्वतंत्र अस्तित्व की दुश्मन बन जाती हैं। ऐसे में सबसे अजब बात यह लगती है कि हम उससे अपनी भावनाओं को ज्या...