बलूची विचार एक फतवा

  निश्चित ही प्रेम मानवीय भावनाओं ंऔर रिश्तों ंको आयाम देता है। उन्हें बलिष्ठ करता है तथा समाज में हमारे चरित्र को स्थापित करता है। किंतु यही प्रेम यदि हम किसी विपरित लिंगी चरित्र से कर लेते हैं, तो यह सबसे बड़ा दुर्गुण बन हमारे सामने पेश होता है। यहां आज तक समझ नहीं आया कि हम अपने रक्त संबंध के साथ जितनी सहजता से अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त कर लेते हैं। उन्हीं स्वच्छंदताओं के साथ हम उन नए रिश्तों में क्यों नहीं अभिव्यक्ति को प्रकट कर पाते हैं, तो हमें हमारे विद्यालयों, कॉलेजों अथवा अन्य कर्म संस्थाओं मे ं प्राप्त होते हैं अथव बनते हैं। यहां चरित्र का द्वण्द्व हमारे दिमाग को पीड़ित क्यों कर देता है। यह किसी अदृश्य फतवे का ही परिणाम होता है कि हम अपने संपूर्ण ज्ञान और मानसिक स्थिति को धूमिल कर उन संकिर्ण विचार के गुलाम बन जाते हैं। अपनी संपूर्ण शिक्षा और ज्ञान का हम अंत कर देते हैं, जिसमें हमने आत्मबल, स्वविवेक और स्वनिर्णय की दक्षता प्राप्त की होती है। बड़ी हास्यास्पद सी लगती है यह बातें कि हमें जिस उद्देश्य से पढ़ाया और बौद्धिक प्रोढ़ता प्रदान की जाती है, यदि हम उसका उपयोग करने लगें तो वह अन्य को खटकने लगती है। मानता हूं कि विचार द्वण्द्वा का प्रतिबिंम्ब है और द्वण्द्व से ही शोध प्रक्रिया होती है एक नया निष्कर्ष जन्म लेते है। किंतु समाज जब तक नवीन विचारों को प्रयोग ही नहीं करने देगा, तब तक कैसे द्वण्द्व की स्थिति जन्म लेगी और नए विकासोंमुख विचार जन्म लेंगे।

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