सही-गलत part 3
![]() |
ADITYA DEV PANDEY |
एक दिन राजन आॅफिस पहुंचा तो अनन्या उससे पहले ही वहां पहुंच उसका इंतजार कर रही थी। राजन को देखते ही वह खुशी से उछलते हुए बोली, राजन! आज मैं बहुत खुश हूं। और, तुम •ाी यह सुनकर झूम उठोगे कि हमारे प्रोजेक्ट को बॉस ने सहमति दे दी है और वह आज शाम को बाजार में आ जाएगा। इसके बाद दोनों ने इस खुशी को आॅफिस के दोस्तों के साथ सेलिब्रेट किया और वहीं अपनी शादी की घोषणा •ाी कर दी। इसके बाद दोनों शादी की तैयारियों में जुट गए जिस कारण लग•ाग दस-बारह दिन उनकी एक दूसरे से मुलाकात नहीं हो सकी। एक दिन अनन्या बाजार गई हुई थी, जहां उसे अपनी कंपनी का सच और झूठ बताने वाला ब्रेसलेट नजर आया। वह उसकी कीमत दुकानदार से पूछती है तो मालूम चलता है कि युवाओं में इसकी जबर्दस्त मांग के चलते इसका दाम तीन गुणा ज्यादा है। खैर एक ब्रेसलेट अनन्या •ाी अपने साथ लेकर घर आई और राजन को फोन कर आॅफिस की रेस्टोरेंट में बुलाया। राजन उसके एक बुलावे पर ही सब काम छोड़ वहां पहुंच गया। राजन •ाी काफी समय से न मिलने के कारण काफी परेशान था। वह जल्द से जल्द अनन्या से मिलना चाहता था। उसे देखना चाहता था। उसे अपने पास महसूस करना चाहता था। राजन वहां पहुंचा तो अनन्या ब्रेसलेट दिखाते हुए एक धीमी हंसी के साथ बोली, अपना प्रोजेक्ट। जिसे सबसे पहले हमारी कलार्इं पर होना चाहिए था। आखिर इसी ने तो हमें एक दूजे से मिलाया है। इसे हम कैसे •ाूल सकते हैं। यह हमारे रिश्ते की जान है। राजन अपनी हथेलियों में अनन्या के चेहरे को कैद कर उसकी खुशी को निहारने लगा। कुछ देर बाद अनन्या बोली, अच्छा राजन आप बुरा न मानों तो मैं इस ब्रेसलेट को ट्राई करूं। राजन माथे को सिकोड़ते हुए बोला, ट्राई! पर इसकी क्या जरूरत है? अनन्या गाल फुलाते हुए बोली, जरूरत है। बोलों न आप आपसे कुछ पूछूं। राजन ने उत्तर दिया। हां क्यों नहीं! अनन्या ने ब्रेसलेट को राजन की कलाई पर बांध कर पूछा... राजन आप सबसे ज्यादा किसको प्यार करते हो। राजन ने बड़े सहज •ााव से उत्तर दिया, तुमको अनन्या और किसको। और, कलाई पर बंधे ब्रेसलेट की लाल बत्ती जल गई। अनन्या चौक गई। यह क्या तुम मुझसे झूठ बोल रहे हो। यह लाल बत्ती क्यों जली! राजन ने अपने को सच सिद्ध करने के लिए फिर कहा, अनन्या वाकई में मैं सिर्फ तुमको ही सबसे ज्यादा चाहता हूं। और फिर एक बार और लाल बत्ती जल उठी। अनन्या गुस्से में बोली, राजन! क्या मेरे अलावा •ाी जुम्हारी जिंदगी में कोई है जिसे तुम मुझसे •ाी ज्यादा प्यार करते हो। राजन ने कलाइयों की तरफ देखते हुए उत्तर दिया, बिल्कुल नहीं अनन्या। और इस बार फिर लाल बत्ती ही जली और अनन्या का चेहरा गुस्से से लाल-लाल हो गया। अनन्या का गुस्सा अपने सातवे आसमान पर था। वह सोच में डूब गई कि देखो •ाला राजन को कितना ढीठ है। झूठ पर झूठ बोले जा रहा है। और अनन्या गुस्से में राजन के झूठ पर तमतमाती हुई बिना उसे देखे-समझे वहां से उठ घर की ओर निकल पड़ी। फिर पीछे मुड़कर बोली, राजन! जिसको चाहते हो उसी से विवाह •ाी कर लेना। आज के बाद हमारा रिश्ता खत्म।
राजन ने उसका हाथ पकड़ने की कोशिश तो की, पर अनन्या झटकते हुए वहां से निकल गई। राजन को बहुत गुस्सा आया। सबसे सामने इस तरह बात का बतंगड़ बनाने की क्या जरूरत थी। वह उसे कितना अच्छा मानता था और वह इतनी छोटी सोच की निकली। अरे, यह ब्रेसलेट गलत नहीं बता सकता क्या? और हो सकता है कि यह प्रेम के •ााव को बांटने में असमर्थ हो। आखिर अनन्या के अलावा कई रिश्ते और •ाी तो हैं, जिन्हें हम बहुत प्रेम करते हैं। क्या प्रेमिका के मिलने के बाद जिसे हम वर्षों से प्रेम करते हैं, जिन्हें हम पूजते हैं वह द्वितीयक स्थान पर चले जाते हैं। ऐसा असं•ाव है। पर इसे अनन्या जैसी सुलझी लड़की क्यों नहीं समझ पाई। अजीब है वह •ाी! यदि एक छोटी सी बात पर वह इतना बड़ा निर्णय ले सकती है तो परिवार क्या खाक चला पाएगी। अच्छा हुआ सही फैसला, सही समय पर हो गया। राजन इन्हीं द्वंद्वात्मक विचारों से जूझता घर निकल गया। राजन घर पहुंच शांति के लिए छत पर चला गया। जहां उसे कुछ सुकून और अकेलापन महसूस हुआ। अब वह पछता रहा था कि आखिर वह अनन्या को क्यों नहीं रोका। वह अपनी बात शायद उसे रोककर समझा सकता था। फिर सोचता कि आखिर अनन्या •ाी सुनने के मूड में कहां थी जो उसे समझाता। वह इसके बाद डूबते सूरज को देखने लगा। उसे सूरज की दशा देख ऐसा लगा जैसे बस उसकी खुशियों के दिन की यही अंतिम शाम है। हर उजाले के बाद अंधेरा छाता है और उसकी जिंदगी का उजाला सिर्फ यहीं तक था। अब सिर्फ अंधेरा ही अंधेरा है। वह इन्हीं सोचों में डूबा छत के एक कोने में सो गया। सुबह की मधुर कलरव के साथ उसकी नींद खुल गई। वह जब ऊपर देखा तो वह सूरज जो कल डूब गया था आज एक नए ओज के साथ फिर खिल चुका था। शायद वह यह बता रहा था कि जिंदगी में शाम और अंधेरा परेशानी नहीं, बल्कि ये हमें उलझी जिंदगी को सुलझाने के लिए वक्त देते हैं। यह एक नए दिन के स्वागत के लिए आते हैं। जिसे हम सुबह की •ाागम-•ााग में शायद न समझ सकें। ये तो हमारे दौड़ते दिमाग को आराम पहुंचाते हैं। अंधेरा न होता तो शायद यह सुबह •ाी इतनी सुहानी न होती। हम दिन के उजाले में जिंदगी को समझते हैं। उसके लिए ऊर्जा का संचयन करते हैं और शाम को सब परेशानियों, •ााग-दौड़ व थकान को मिटाते हुए अपने परिवार संग खुशियां मनाते हैं। अपनी गलतियों पर विचार कर सही का निर्णय लेते हैं। शायद यह शाम न होती तो जीवन में कोई जश्न •ाी न होता। इन्हीं खयालों में डूबा राजन खुद को कोसने लगा कि जिंदगी में आई एक धुंध को •ाी वह सही से सं•ााल नहीं पाया और देखो तो •ाला विवाह करने चला था।
उधर अनन्या राजन को छोड़ने के बाद सीधे हॉस्टल पहुंची और सरदर्द की गोली खाकर सो गई। उसे बहुत गुस्सा आ रहा था कि आखिर राजन उससे झूठ कैसे बोल सकता है। वह इसी वाक्य पर पूरी तरह से टिक गई थी। इसके अलावा उसे अब कुछ •ाी सूझ नहीं रहा था। हां, इस वक्त यदि क•ाी राजन का मुस्कुराता चेहरा उसके ख्यालों में आता तो वह दबी जुबान से उसे धोखेबाज, कपटी कह खुद को तसल्ली देती। थोड़ी देर बार ही उसे नींद आई गई। सुबह जब वह जगी तो उसने सब आप बीती अपनी रूममेट रागिनी को सुना दी। रागिनी सब वृतांत सुनने के बाद एक स्वर में बोली, तो क्या वह अब अपने परिवार को •ाी प्रेम नहीं कर सकता क्या। हो सकता है वह अपनी मां या बहन को बहुत ज्यादा चाहता हो, जिसके कारण तेरे ब्रेसलेट ने लालबत्ती जला दी हो। तू •ाी ना। और रागिनी वहां से चली गई। इसके बाद तो अनन्या को अपने व्यवहार पर पछतावे के बादल मडराने लगे। आखिर वह राजन के •ारोसे पर संदेह कैसे कर सकती है। आज उसके दिमाग को ऐसा क्या हो गया था, जो वह इतनी छोटी बात •ाी समझ नहीं पाई और यदि वह झूठ •ाी बोल रहा था तो यह कहां का न्याय है कि वह उसे छोड़ दे। यदि शादी हो गई होती तो •ाी क्या वह उसे छोड़ देती। नहीं न। फिर उसने ऐसा क्यों किया? वह परेशान होकर सोचने लगी कि आखिर अब वह क्या करे? हम अपने परिवार में कितनी ही जगह और कितनी बार झूठ बोलते हैं और वे हमारे झूठ को •ाापकर •ाी हमारी खुशी के लिए उसी को जी लेते हैं। वे रिश्ते नहीं खत्म करते। हां, वक्त आने पर वे हमें सही और गलत से जरूर रूबरू कराते हैं। फिर वह कैसे इतना बड़ा फैसला एक ही पल में लेकर चली आई। अनन्या इन बातों को सोचकर काफी परेशान हो उठी।
इधर राजन •ाी काफी परेशान था कि वह कैसे अनन्या से बात करे। सुबह से सैकड़ों कॉल कर चुका था, पर अनन्या का मोबाइल आॅफ आ रहा था। उसने घड़ी की तरफ देखा तो आॅफिस जाने के समय में तीन घंटे का समय था। वह आज जल्दी आॅफिस जाकर अनन्या से बात करना चाहता था। यदि वह उसे गलत मानती है तो वह माफी मांगने को •ाी तैयार था। उधर अनन्या •ाी राजन की तरह समान सोच-समझ लिए अपनी स्कूटी उठाती है और आॅफिस की ओर तेज गति से निकल जाती है। रास्ते में एक चौराहे पर लाल बत्ती जलने के कारण वह स्कूटी का ब्रेक लगा बत्ती के हरे होने का इंतजार करने लगती है। त•ाी एक वृद्ध महिला और कुछ स्कूली बच्चे बड़ी सहजता से उसके सामने से रास्ता पार करते हैं। अनन्या उन्हें देख सोचने लगती है कि आखिर ये लाल बत्ती जिसे हम व्यवधान समझते हैं और इससे चिढ़ते हैं। वह वास्तव में हम सब की सहूलियत के लिए ही तो है। यह लाल बत्ती न होती तो शायद हमारी जिंदगी में कितनी अव्यवस्था होती। कितने ही घरों में आए दिन मातम फैला रहता। यह तो जिंदगी देती है और मैं इसी लाल बत्ती से शाम को चिढ़ गई थी। ट्रेन के सामने •ाी लाल बत्ती जलती है तो हम झुझला जाते हैं। पर एक बार •ाी यह नहीं सोचते कि यहां हजारों जिंदगियों का सवाल होता है। हम इतने स्वार्थी हैं कि हमें समाज और व्यवस्था से कोई मतलब ही नहीं होता। त•ाी अनन्या की नजर चौराहे पर कुछ बच्चों और युवाओं की कलाइयों पर पड़ी, जिनपर वही सच और झूठ बताने वाली ब्रेसलेट बंधी थी। कुछ एक दूसरे से तेरी कसम कह कर बात कर रहे थे तो कुछ बिल्कुल सच बोल रहा हूं बोलते हुए फोन पर बात कर रहे थे। पर इस सब में कॉमन था तो सिर्फ उनकी कलाइयों पर बंधी ब्रेसलेट व उसकी जलती लाल बत्ती। अनन्या को अब समझ में आ गया था कि यदि जिंदगी में झूठ को निकाल दिया जाए तो कई रिश्ते टूट जाएंगे। सच का तो अस्तित्व ही नष्ट हो जाएगा। क्योंकि सच का रूप तो हमारे रिश्ते होते हैं। वहीं यदि एक झूठ से रिश्तों में विश्वास और मजबूती खुशियों के साथ बनी हुई है तो फिर हम इस झूठ से क्यों परहेज करें। वास्तव में जीवन में जितनी सच की जरूरत है, उतनी ही झूठ की •ाी आवश्यकता है। पर हम इन चीजों के लिए रिश्तों को दाव पर नहीं लगाते। बल्कि, रिश्तों को मजबूत बनाने के लिए इनका प्रयोग करते हैं। राजन तो झूठ •ाी नहीं बोल रहा था। वह तो सब सच कह रहा था। यदि झूठ •ाी बोलता सिर्फ मेरी खुशी के लिए तो क्या गलत था। मुझे तो उसपर फक्र होना चाहिए था कि वह मेरी खुशी के लिए सच तो सच झूठ •ाी बोल सकता है। वह मेरी खुशी के लिए कुछ •ाी कर सकता है। वह इतना अच्छा है और मैं उसे ऐसे धिक्कार कर चली आई। त•ाी हरी लाइट जल जाती है और अनन्या अपनी स्कूटी को रफ्तार देते हुए आॅफिस पहुंचती है। जहां उसे पार्किंग में ही राजन उसका इंतजार करता बाइक पर बैठा नजर आता है। अनन्या उसे देख नजर नीचे कर लेती है। अब दोनों समझ चुके थे कि गलती हो चुकी है। वर्तमान में वह मौजूद नहीं है। दोनों मुस्कुराते हैं अपने उस बचपने पर और हंसते हुए एक दूसरे के कंधे पर हाथ रख कैंटीन की ओर बढ़ जाते हैं।
राजन ने उसका हाथ पकड़ने की कोशिश तो की, पर अनन्या झटकते हुए वहां से निकल गई। राजन को बहुत गुस्सा आया। सबसे सामने इस तरह बात का बतंगड़ बनाने की क्या जरूरत थी। वह उसे कितना अच्छा मानता था और वह इतनी छोटी सोच की निकली। अरे, यह ब्रेसलेट गलत नहीं बता सकता क्या? और हो सकता है कि यह प्रेम के •ााव को बांटने में असमर्थ हो। आखिर अनन्या के अलावा कई रिश्ते और •ाी तो हैं, जिन्हें हम बहुत प्रेम करते हैं। क्या प्रेमिका के मिलने के बाद जिसे हम वर्षों से प्रेम करते हैं, जिन्हें हम पूजते हैं वह द्वितीयक स्थान पर चले जाते हैं। ऐसा असं•ाव है। पर इसे अनन्या जैसी सुलझी लड़की क्यों नहीं समझ पाई। अजीब है वह •ाी! यदि एक छोटी सी बात पर वह इतना बड़ा निर्णय ले सकती है तो परिवार क्या खाक चला पाएगी। अच्छा हुआ सही फैसला, सही समय पर हो गया। राजन इन्हीं द्वंद्वात्मक विचारों से जूझता घर निकल गया। राजन घर पहुंच शांति के लिए छत पर चला गया। जहां उसे कुछ सुकून और अकेलापन महसूस हुआ। अब वह पछता रहा था कि आखिर वह अनन्या को क्यों नहीं रोका। वह अपनी बात शायद उसे रोककर समझा सकता था। फिर सोचता कि आखिर अनन्या •ाी सुनने के मूड में कहां थी जो उसे समझाता। वह इसके बाद डूबते सूरज को देखने लगा। उसे सूरज की दशा देख ऐसा लगा जैसे बस उसकी खुशियों के दिन की यही अंतिम शाम है। हर उजाले के बाद अंधेरा छाता है और उसकी जिंदगी का उजाला सिर्फ यहीं तक था। अब सिर्फ अंधेरा ही अंधेरा है। वह इन्हीं सोचों में डूबा छत के एक कोने में सो गया। सुबह की मधुर कलरव के साथ उसकी नींद खुल गई। वह जब ऊपर देखा तो वह सूरज जो कल डूब गया था आज एक नए ओज के साथ फिर खिल चुका था। शायद वह यह बता रहा था कि जिंदगी में शाम और अंधेरा परेशानी नहीं, बल्कि ये हमें उलझी जिंदगी को सुलझाने के लिए वक्त देते हैं। यह एक नए दिन के स्वागत के लिए आते हैं। जिसे हम सुबह की •ाागम-•ााग में शायद न समझ सकें। ये तो हमारे दौड़ते दिमाग को आराम पहुंचाते हैं। अंधेरा न होता तो शायद यह सुबह •ाी इतनी सुहानी न होती। हम दिन के उजाले में जिंदगी को समझते हैं। उसके लिए ऊर्जा का संचयन करते हैं और शाम को सब परेशानियों, •ााग-दौड़ व थकान को मिटाते हुए अपने परिवार संग खुशियां मनाते हैं। अपनी गलतियों पर विचार कर सही का निर्णय लेते हैं। शायद यह शाम न होती तो जीवन में कोई जश्न •ाी न होता। इन्हीं खयालों में डूबा राजन खुद को कोसने लगा कि जिंदगी में आई एक धुंध को •ाी वह सही से सं•ााल नहीं पाया और देखो तो •ाला विवाह करने चला था।
उधर अनन्या राजन को छोड़ने के बाद सीधे हॉस्टल पहुंची और सरदर्द की गोली खाकर सो गई। उसे बहुत गुस्सा आ रहा था कि आखिर राजन उससे झूठ कैसे बोल सकता है। वह इसी वाक्य पर पूरी तरह से टिक गई थी। इसके अलावा उसे अब कुछ •ाी सूझ नहीं रहा था। हां, इस वक्त यदि क•ाी राजन का मुस्कुराता चेहरा उसके ख्यालों में आता तो वह दबी जुबान से उसे धोखेबाज, कपटी कह खुद को तसल्ली देती। थोड़ी देर बार ही उसे नींद आई गई। सुबह जब वह जगी तो उसने सब आप बीती अपनी रूममेट रागिनी को सुना दी। रागिनी सब वृतांत सुनने के बाद एक स्वर में बोली, तो क्या वह अब अपने परिवार को •ाी प्रेम नहीं कर सकता क्या। हो सकता है वह अपनी मां या बहन को बहुत ज्यादा चाहता हो, जिसके कारण तेरे ब्रेसलेट ने लालबत्ती जला दी हो। तू •ाी ना। और रागिनी वहां से चली गई। इसके बाद तो अनन्या को अपने व्यवहार पर पछतावे के बादल मडराने लगे। आखिर वह राजन के •ारोसे पर संदेह कैसे कर सकती है। आज उसके दिमाग को ऐसा क्या हो गया था, जो वह इतनी छोटी बात •ाी समझ नहीं पाई और यदि वह झूठ •ाी बोल रहा था तो यह कहां का न्याय है कि वह उसे छोड़ दे। यदि शादी हो गई होती तो •ाी क्या वह उसे छोड़ देती। नहीं न। फिर उसने ऐसा क्यों किया? वह परेशान होकर सोचने लगी कि आखिर अब वह क्या करे? हम अपने परिवार में कितनी ही जगह और कितनी बार झूठ बोलते हैं और वे हमारे झूठ को •ाापकर •ाी हमारी खुशी के लिए उसी को जी लेते हैं। वे रिश्ते नहीं खत्म करते। हां, वक्त आने पर वे हमें सही और गलत से जरूर रूबरू कराते हैं। फिर वह कैसे इतना बड़ा फैसला एक ही पल में लेकर चली आई। अनन्या इन बातों को सोचकर काफी परेशान हो उठी।
इधर राजन •ाी काफी परेशान था कि वह कैसे अनन्या से बात करे। सुबह से सैकड़ों कॉल कर चुका था, पर अनन्या का मोबाइल आॅफ आ रहा था। उसने घड़ी की तरफ देखा तो आॅफिस जाने के समय में तीन घंटे का समय था। वह आज जल्दी आॅफिस जाकर अनन्या से बात करना चाहता था। यदि वह उसे गलत मानती है तो वह माफी मांगने को •ाी तैयार था। उधर अनन्या •ाी राजन की तरह समान सोच-समझ लिए अपनी स्कूटी उठाती है और आॅफिस की ओर तेज गति से निकल जाती है। रास्ते में एक चौराहे पर लाल बत्ती जलने के कारण वह स्कूटी का ब्रेक लगा बत्ती के हरे होने का इंतजार करने लगती है। त•ाी एक वृद्ध महिला और कुछ स्कूली बच्चे बड़ी सहजता से उसके सामने से रास्ता पार करते हैं। अनन्या उन्हें देख सोचने लगती है कि आखिर ये लाल बत्ती जिसे हम व्यवधान समझते हैं और इससे चिढ़ते हैं। वह वास्तव में हम सब की सहूलियत के लिए ही तो है। यह लाल बत्ती न होती तो शायद हमारी जिंदगी में कितनी अव्यवस्था होती। कितने ही घरों में आए दिन मातम फैला रहता। यह तो जिंदगी देती है और मैं इसी लाल बत्ती से शाम को चिढ़ गई थी। ट्रेन के सामने •ाी लाल बत्ती जलती है तो हम झुझला जाते हैं। पर एक बार •ाी यह नहीं सोचते कि यहां हजारों जिंदगियों का सवाल होता है। हम इतने स्वार्थी हैं कि हमें समाज और व्यवस्था से कोई मतलब ही नहीं होता। त•ाी अनन्या की नजर चौराहे पर कुछ बच्चों और युवाओं की कलाइयों पर पड़ी, जिनपर वही सच और झूठ बताने वाली ब्रेसलेट बंधी थी। कुछ एक दूसरे से तेरी कसम कह कर बात कर रहे थे तो कुछ बिल्कुल सच बोल रहा हूं बोलते हुए फोन पर बात कर रहे थे। पर इस सब में कॉमन था तो सिर्फ उनकी कलाइयों पर बंधी ब्रेसलेट व उसकी जलती लाल बत्ती। अनन्या को अब समझ में आ गया था कि यदि जिंदगी में झूठ को निकाल दिया जाए तो कई रिश्ते टूट जाएंगे। सच का तो अस्तित्व ही नष्ट हो जाएगा। क्योंकि सच का रूप तो हमारे रिश्ते होते हैं। वहीं यदि एक झूठ से रिश्तों में विश्वास और मजबूती खुशियों के साथ बनी हुई है तो फिर हम इस झूठ से क्यों परहेज करें। वास्तव में जीवन में जितनी सच की जरूरत है, उतनी ही झूठ की •ाी आवश्यकता है। पर हम इन चीजों के लिए रिश्तों को दाव पर नहीं लगाते। बल्कि, रिश्तों को मजबूत बनाने के लिए इनका प्रयोग करते हैं। राजन तो झूठ •ाी नहीं बोल रहा था। वह तो सब सच कह रहा था। यदि झूठ •ाी बोलता सिर्फ मेरी खुशी के लिए तो क्या गलत था। मुझे तो उसपर फक्र होना चाहिए था कि वह मेरी खुशी के लिए सच तो सच झूठ •ाी बोल सकता है। वह मेरी खुशी के लिए कुछ •ाी कर सकता है। वह इतना अच्छा है और मैं उसे ऐसे धिक्कार कर चली आई। त•ाी हरी लाइट जल जाती है और अनन्या अपनी स्कूटी को रफ्तार देते हुए आॅफिस पहुंचती है। जहां उसे पार्किंग में ही राजन उसका इंतजार करता बाइक पर बैठा नजर आता है। अनन्या उसे देख नजर नीचे कर लेती है। अब दोनों समझ चुके थे कि गलती हो चुकी है। वर्तमान में वह मौजूद नहीं है। दोनों मुस्कुराते हैं अपने उस बचपने पर और हंसते हुए एक दूसरे के कंधे पर हाथ रख कैंटीन की ओर बढ़ जाते हैं।

Comments
Post a Comment