एक लड़की की डायरी : थैंक्स गिविंग: मेरा दोस्त है शिशिर। अमेरिका के कैलिफ़ोर्निया शहर में रहता है। कल उसका दोपहर को फ़ोन आया। शुरू में तो थोड़ी हैरानी हुई। दरअसल उस वक़्त व...
#aditya #adityadev #delhi #ncr #ghaziabad #love #pyar #ishq #muhabbad #up पतझड़ सा मैं बिखर जाऊंगा एक दिन सबसे जुदा हो जाउंगा पर मैं रहूंगा उनके आसपास सूखी गिरती बिखरी पत्तियों की तरह खाद , मिट्टी धूल बनकर लिपट जाऊंगा अपनों के कदमों से हवाओं पर बैठ चुमूंगा अपनों का माथा हथेलियों से लिपट एहसास को जियूंगा जब तूफान आएगा तो दूर परदेश में बसे अपनों से मिलूंगा और लिपटकर प्यार करूंगा बारिश के पानी में घुलकर घर में भी आउंगा नमी बनकर पर अपने हिस्से के रिश्तों से कभी जुदा नहीं होउंगा मैं पतझड़ से जरूर बिखरा हूं पर आस के साथ आसपास हमेशा ही रहूंगा।
आदित्य देव पाण्डेय with arun sharma and kamlesh pandey raju mishra, TRAYAMBAK MISHRA, ramesh dev, and vijya pandey traymbak mishra. vijya pandey and आदित्य देव पाण्डेय raju mishra, trayambak mishra, ramesh dev, and vijya pandey TRAYAMBAK MISHRA आदित्य देव पाण्डेय इन सांसों को ये पता नहीं है कि वो जिसकी जिंदगी हंै वह अच्छा है या बुरा। लेकिन वह अपने कार्य को बहुत ही सहजता से करती जाती हैं। वह •ाी नि:स्वार्थ। पर हम इसके उलट कार्य करते हैं। जब तक हमें किसी से खुशी या सकारात्मक सोच या व्यवहार मिलता है तब तक वह हमें अच्छा लगता है, लेकिन जैसे ही हमें उससे नाकारात्मक ऊर्जा का अहसास मात्र होता है हम उसे छोड़ उससे बेहतर साथी की तलाश में जुट जाते हैं। या फिर, इंसान और इंसानियत को कोसते हुए कुंठा के महासागर में गोते लगाने लगते हैं। आज की कहानी •ाी कुछ ऐसी ही है। कहानी शुरू होती है एक इलेक्ट्रॉनिक खिलौने बनाने वाली कंपनी के मीटिंग हॉल से। जहां राजन को उसके बॉस एक ऐसा ब्रेसलेट बनाने पर चर्चा कर रहे हैं, जिसे पहनते ही उसमें लगी लाल और हरे रंग की बत्ती सच और झूठ का फैसल...
आदित्य देव पाण्डेय जिंदगी में कभी अचानक ही हम उन अनुभवों से गुजरने लगते हैं जिसका कभी हमारे जीवन में कोई महत्व नहीं होता है। या यूं कहें कि जो हमें सबसे बुरा गुण लगता है। कुछ ऐसा ही भाव युक्त व्यवहार होता है प्यार। न जाने कब यह हमारे जीवन में दाखिल हो हमें अपने कब्जे में ले लेता है मालूम ही नहीं चलता। समझ नहीं आता कि इस समाजिक बुराई में वह कौन सी अच्छाई उस दौरान नजर आने लगती है जब यह हमारे रक्त में वेग का स्वरूप ग्रहण कर लेता है। सच कहें तो इसके आने के बाद ही हमें रिश्तों का अहसास होता है। इससे पूर्व सिर्फ हम रिश्तों के नैतिक बुनियाद को ही जी रहे होते हैं। लेकिन इससे भीगने के बाद हम यह जानते हैं कि रिश्ते होते क्या हैं? हम इसी दौरान अपने महत्व से भी परिचित होते हैं और फिर हमारे लिए हर वक्त और व्यक्ति महत्वपूर्ण होने लगते हैं। हम उसी दौरान समाजिक बुराइयों जैसे वह क्या सोचेंगे? वह क्या कह रहे होंगे आदि को दरकिनार कर भारतीय बुराई दहेज, दिखावा और अपव्यय जैसी समस्याओं के विरोधक बन जाते हैं। वास्तव में अद्भुत दौर होता है, जब यह प्रेम हमारे करीब होता है। लेकिन समाज की नजरो...
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