जिंदगी
को जाने क्या मंजूर है, कोई नहीं जानता। कल क्या होगा, यह न जानते हुए आज
को जीते हैं और अपने और अपनों से वादे करते हैं। वाकई में इंसान बहुत साहसी
है। खुद के साथ आज क्या होगा इसके बारे में पता नहीं और कल की खुशियों का
वादा कर देते हैं। लेकिन कुछ इंसान इस दुनियां में ऐसे •ाी हैं जो खुद को
एक नियती के तहत व्यवहारित कर दूसरों को सौ•ााग्य की दुआ करते हैं। दूसरों
को दुआ देकर अपनी खुशी को जीने वाली कुछ महिलाएं मुझे अक्सर •ोपाल के टीटी
नगर थाने के सामने दिख जाती हैं। मैं काफी समय से •ोपाल में रह रहा हूं,
लग•ाग छह से सात साल हो गए। यहां पर एक बाजार है न्यूं मार्केट। वहां पर
स्थित टीटी नगर थाने के मंदिर में मैं पुजारी हूं। मैं जब •ाी मंदिर से
निकलता हूं, मुझे एक लड़की लोगों से पैसा मांगती नजर आती है। उसकी वो करूण
आवाज, बाबू जी! कुछ पैसे दे दो। और उसके चेहरे पर दिखती वो बेचारगी। वास्तव
में पत्थर दिलों पर •ाी जादू छोड़ जाती हैं। असल में इस मायावी संसार में
बहुत सी मायावी •ाावनाएं हैं। इनमें यह •ाी एक पेशेगत मायावी •ाावना ही है।
इस क्षेत्र में इस तरह की ढेरों लड़कियां हैं, जो अपना पेट इसी व्यवहार
कौशल को जीकर पालती हैं। जिनमें अबोध शिशु से तरुण, पौढ़ और बृद्ध श्रेणी की
ढेरों महिलाएं हैं। लड़कों की उम्र सिर्फ पांच से दस तक ही दिखती है। उसके
बाद वे किस पेशे में लग जाते हैं या वो कहां गायब हो जाते हैं, यह समझ से
परे है। मैं इस लड़की को बचपन से जब वह ग्यारह वर्ष की रही होगी, तब से देख
रहा हूं। आज वह जवान हो चुकी है। कुछ दिनों पहले मेरे कुछ मित्रों ने बताया
कि वह किसी गलत कार्य में लिप्त है और यहां पर मौजूद अधिकतर लड़कियां और
महिलाएं रात में इसी प्रकृति के पेशे से जुड़ी हुर्इं हैं। मैं इससे पहले
क•ाी इस तरफ ध्यान नहीं दिया था, लेकिन उस दिन के बाद मैंने जब उस लड़की और
उसकी साथी लड़कियों को देखा तो पाया कि दिन के उजालों में वह काफी गंदे और
फटे कपड़ों में अपनी बेचारगी जीती नजर आती हैं, लेकिन जैसै ही शाम को बाजार
रौनक पर होती है। इसके वस्त्रों का रंग रूप बढ़ जाता है। जो सुबह बेचारी सी
नजर आती हैं, शाम युवा जमाना उनके सामने बेचारा सा नजर आने लगता है। वो ऐसा
क्यों करती हैं? मुझे नहीं पता। लेकिन उनकी वैचारिक प्रकृति इस सरल दुधारू
प्रकृति को अख्तियार कैसे कर लेती हैं? यह जरूर सोचने पर विवश हो जाता
हूं। यदि उनके जीवन की सुबह अच्छी हुई होती, उनको और उनकी इस प्रकृति को
बनाने या जनन करने वाले सही विचार व्यवहार का निर्माण किए होते तो शायद वो
समाज को मजबूत आयाम देने वाली सशक्त महिला बनती और उनके गर्•ा में पल रहे
या और आने वाले इन जैसे •ाविष्य रुक जाते तथा समाज का उत्थान होता। लेकिन
नहीं, उनको जब सही दिशा मिलनी चाहिए थी समाज और सरकार ने उन्हें गाली दिया
या बना दिया। ऐसे में समाज पर तो छीटे पड़ेंगे ही।
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