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पहले कहानी में एक आंगन होता था

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पहले कहानी में एक आंगन होता था भाइयों के प्रेम से सुहाना घर सजता था। खेत होते थे ,  खलिहान होता था भाई का हक ही भाई का अरमान होता था। एक कमाई पर टिका पूरा खानदान होता था भाभियों की हंसी से सजा सास का अरमान होता था।    बुजुर्गों की दहाड़ द्वार का श्रृंगार होता था    गायों की सेवा करने वालों का नाम होता था। बुआ-बहनों की खुशियों में ही अभिमान होता था मामा बच्‍चों के लिए बचपन का धाम होता था। जमीं ,  छत ,  बाग ,  घर अब सब संपत्‍ती बन गए आज प्रेम से भरे दिल में दौलत का बाजार सज गया। हक की रोशनी में रिश्‍ते खो गए प्‍यारा आंगन पैसों के जाल में जाने कब जल गया। सरकार की सड़क ने परिवारों को रौंदकर टुकड़ों में फैले लोगों का महल बना दिया। सुना है खुशियों के लिए लोग दर-बदर भटक रहे अपनों के साथ हंसने-बैठने का हक जो गवां दिया।     -------------------**  

माना कि इश्क किसी की जागीर नहीं है

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पर ये अश्कों की तामीर भी नहीं है। बड़े वक्त दिए हैं जो दिल तेरी इबादत में लगे इस तसल्ली का सिला दर्द-ए-जुदाई तो नहीं है। माना न मिलन ,  न निकाह लिखा है मेरी कहानी में तेरे खूबसूरत ख्वाबों पर किसी का लगाम तो नहीं है।   अब बाहों में तेरे रकीब का रूतबा ठहर गया    पर तेरी हंसती अठखेलियों का पूरा हिसाब यहीं है। रब का ये दर इतना भी नहीं जालिम ,  नहीं कातिल रुसवाइयों से रोशन दिल में न अब कोई आरजू बची है।   मेरा रब ,  मेरा सब ,  मेरा तकदीर है वो साहिब अच्छा है राहों में अब न कोई ख्याल तलक है। रब में वो ,  उसमें रब का मेल कब हुआ जाने इस वाकये में अब बड़ा गुस्ताख कौन है।   --------------------****  

इश्‍क को समझ कर तो देखिये

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सदा-सर्वदा पाप से तौला जिसे उस प्रेमी वातावरण में एक पल तो गुजारिये।    दिल के सवालों से घिरे मन में झांककर पछतावे से कभी कुछ पूछकर तो देखिये। कितना मचलता होगा दिल तड़पते मौसम में उस दर्द-ए-एहसास से पटी रूह से रूबरू तो हाईये। चार लोगों के फिजूल बवंडर में क्या घिरना जुदाई के जलजले से सहम के तो देखिये। शब-ए-हिज्र की कराहें महसूस न हो तो सुब्ह-ए-विसाल के हसीन पल को याद कीजिए। इश्क की इबादत में न सिर झुकाया हो कभी   तो कम से कम दुआ में पक्के इमान को सजाइये। इश्‍क के रमजान को सौदा गर बनाया हो तो कलमा पढ़कर एक इफ्तार में जरूर जाइये।     पाक सूरह से जो सज न जाए तेरा मासूम दिल तो आयत के खूबसूरत बगीचे में टहल के देखिये। नम आंखों से कभी अपनी जवानी को सोचना फिर इश्‍क सिर्फ आशिकी नहीं इबादत नजर आएगी।   ------------------------***

फिर इश्‍क से मुलाकात हुई

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एक अरसे बाद इश्क से मुलाकात हुई शिमला में सर्द हवाओं में चंद बात हुई। उनके कांपते बदन पर शॉल ओढ़ाते हुए प्यारे जज्‍बातों से दोबारा मुलाकात हुई। सांसों से निकलते उन गर्म हवाओं में सादे प्यार के बादलों की अंगड़ाई दिखी। मॉल रोड के शोर में खड़े थे मगर उनकी धड़कनों में मिलन की मधुर धुन सुनी। चलते-चलते जो छू गईं उनकी छोटी उंगलियां बड़े कदमों ने फिर धीमे होने की एक धुन चुनी। छोटी राहों पर लंबे जज्बातों को संवारते हुए उनकी बातों में प्यार की बड़ी अंगड़ाई दिखी।   पर्वत से झांकती नजरों में नजारे बहुत थे चाहतों की चादर से ढकी फिर एक प्रेम कहानी दिखी। बातों का सिलसिला गर्म हो रहा था हाथों में हाथ लिए वो अब सामने खड़ी दिखी। पुरानी भूल को सही करने की जिद थी मानों अधरों पर अधर के मेल से संवरती आज वो शाम थी। पछतावा ,  पाप ,  अपराध का बोध छलावा बन गया तब मानों हीर की बाहों में समाहित रांझे की मीत दिखी। ---------------------***

कुछ सवाल पूछना है उनसे

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हर रोज एक ऐसा पल आता है बीते वक्त की छांव को जो जीता है! चंद मुस्कान और ढेरों गमों को लाता है हंसते आंखों में उदास रेत भर जाता है! कफन में दबी यादों को संजोकर कफस में कैद कलेजे को जलाता है! वो पूछता है इन हवाओं से चंद बूझे सवाल गुजरे वक्त का लेखा-जोखा कहां रखा जाता है!   उस वक्त से सवाल था कि कमी कहां रह गई सांसें थमी उनके जाने के बाद तो जान क्यों रह गई! कॉलेज की खूबसूरत राहें ,  वो उसकी हंसी से सजे कमरे चमकते ब्रेंच पर उसके नाम की मुहर आखिर कहां गई!    बाइक पर घूमते शहर की सड़कों का इतराना पिकनिक की रौनक में पास बैठी वो हंसी कहां गई! उसकी आवाज से वजू कर संवरने वाले दिन रात की संगीत में खोकर भी रेख़्ता कैसे हो गए! सवाल बहुत देकर चैन लूटने वाले दिन गुमनाम करके हमें ,  किस महफिल में खुद खो गए! पूछना था कि उनकी चाहतों में हम कहां थे उनके वक्त में उस कहानी की कब्र तो बनी होगी! उन बीते वक्त की कोई मजार हो तो बताना उनकी मुस्कान को याद कर दुआ जो करनी है! माना अब न संवरेंगे आज के ये हंसते दिन पर उस वक्त के इत्र से महक तो सकते हैं! ...

क्‍या पछतावे से वो भी रूबरू हुई होगी

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दिल के सवालों से घिरे तेरे मन की तरह क्‍या पछतावे से वो भी रूबरू हुई होगी। जितना तूं तड़पता रहा सालों दरबदर क्‍या वो भी दर्द-ए-एहसास से गुजरी होगी। सवालों के बवंडर से क्‍या वो भी घिरी होगी क्‍या वो भी जुदाई के जलजले से सहमी होगी। शब-ए-हिज्र की उस रात उसने भी कराहे होंगे तुझे याद कर क्‍या मिलन के गीत गाए होंगे। न गई हो वो मंदिर, मस्जिद चर्च तेरी तरह पर क्‍या मुलाकात के लिए वो दुआ भी की होगी। इश्‍क का रमजान जैसे अरसों तक चला तेरा क्‍या वो भी कभी तेरे प्‍यार में एक कलमा पढ़ी होगी। तूने पाक सूरह से सजा दिए मासूम दिल को क्‍या उसने कभी तेरे इश्‍क की एक आयत भी पढ़ी होगी। धोखा, छलावा कहके भी जैसे चाहता रहा तूं क्‍या तेरे भरोसे का पैमाना वो भी समझी होगी।