क्या पछतावे से वो भी रूबरू हुई होगी
दिल के सवालों से घिरे तेरे मन की तरह
क्या पछतावे से वो भी रूबरू हुई होगी।
जितना तूं तड़पता रहा सालों दरबदर
क्या वो भी दर्द-ए-एहसास से गुजरी होगी।
सवालों के बवंडर से क्या वो भी घिरी होगी
क्या वो भी जुदाई के जलजले से सहमी होगी।
शब-ए-हिज्र की उस रात उसने भी कराहे होंगे
तुझे याद कर क्या मिलन के गीत गाए होंगे।
न गई हो वो मंदिर, मस्जिद चर्च तेरी तरह
पर क्या मुलाकात के लिए वो दुआ भी की होगी।
इश्क का रमजान जैसे अरसों तक चला तेरा
क्या वो भी कभी तेरे प्यार में एक कलमा पढ़ी होगी।
तूने पाक सूरह से सजा दिए मासूम दिल को
क्या उसने कभी तेरे इश्क की एक आयत भी पढ़ी होगी।
धोखा, छलावा कहके भी जैसे चाहता रहा तूं
क्या तेरे भरोसे का पैमाना वो भी समझी होगी।





























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