क्यों

 हम प्यार करके भी मोहब्बत से महरूम क्यों रहते हैं।
हम अपन पूरा विश्वास देकर भी विश्वासघाती क्यों कहलाते हैं।
हम रोते है जिसके लिए उसी से मूर्ख क्यों बनते हैं।
हम जिसके लिए कुर्बान कर देते हैं जिंदगी, उसी से आघात क्यों पाते हैं।
हम होश में या बेहाशी में जिसे याद करते हैं, उसी की आंखों की किरकिरी क्यों बन जाते हैं।
हम जिसे अपनी पूरी जिंदगी दे चुके हैं, उसी से सुनापन क्यों पाते हैं।
हम उसको जिसे खुशियां देते हैं, उसी से गम  क्यों पाते हैं।
हम जिसके रूठने पर सबसे ज्यादा परेशान होते हैं, वही हमसे क्यों रूठ जाते हैं।
हम जिनके बिना खुद को तन्हां समझते हैं, वही हमें अकेला क्यों कर जाते हैं।
हम बड़े बेफिक्री से जिसे अपना कहीं भी, कभी भी कह देते हैं, वही इससे परेशान क्यों होते हैं।
हम जिन्हें खुदा कहते हैं, वही हमें कष्टों की माला क्यों पहना जाते हैं।
हम जिसे सपनों के उजाले में हमेंशा करीब पाते हैं, वहीं रोशनी में हमसे दूर क्यों होते हैं।
हम जिसे अपना कह इतराते हैं, वहीं हमसे कतराते क्यूं हैं।
हम तो सिर्फ प्यार करते हैं, न जाने ऐसे में हम क्या गुनाह करते हैं।

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